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चंद्र ग्रहण - चंद्र ग्रहण तिथि, सूतक काल और ज्योतिषीय प्रभाव

चंद्र ग्रहण २०२६ – वैदिक ज्योतिष में चंद्र ग्रहण का महत्व और प्रभाव

वैदिक ज्योतिष के अनुसार चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आकर चंद्रमा के प्रकाश को ढक देती है। यह घटना पूर्णिमा के दिन होती है और राहु-केतु के संरेखण से बनती है। चंद्र ग्रहण को भावनात्मक और कर्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

चंद्रमा मन, भावनाएँ, माता, मानसिक शांति और संवेदनशीलता का कारक है। इसलिए चंद्र ग्रहण के दौरान भावनात्मक उतार-चढ़ाव और मानसिक परिवर्तन अनुभव हो सकते हैं।

चंद्र ग्रहण का ज्योतिषीय प्रभाव

चंद्र ग्रहण का प्रभाव आपकी चंद्र राशि, लग्न और जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि ग्रहण प्रथम, चतुर्थ, सप्तम या दशम भाव में हो, तो इसका प्रभाव अधिक स्पष्ट हो सकता है।

ग्रहण काल में भावनात्मक निर्णय और संबंधों से जुड़े विषयों में सावधानी बरतनी चाहिए।

सूतक काल और धार्मिक मान्यताएँ

चंद्र ग्रहण से पहले शुरू होने वाला सूतक काल आध्यात्मिक रूप से संवेदनशील माना जाता है। इस समय शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है और जप व ध्यान करना शुभ माना जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का जप चंद्र ग्रहण के दौरान अत्यंत लाभकारी माना जाता है। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और दान करना भी शुभ है।

चंद्र ग्रहण का आध्यात्मिक महत्व

चंद्र ग्रहण आत्मचिंतन, भावनात्मक शुद्धि और कर्मिक मुक्ति के लिए श्रेष्ठ समय है। यह नकारात्मक प्रवृत्तियों को छोड़ने और मानसिक स्पष्टता पाने में सहायक होता है।

क्या चंद्र ग्रहण मानसिक शांति को प्रभावित करता है?

चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए ग्रहण के दौरान भावनात्मक उतार-चढ़ाव संभव हैं।

चंद्र ग्रहण का प्रभाव कितने समय तक रहता है?

इसका प्रभाव जन्म कुंडली और वर्तमान दशा पर निर्भर करता है और कई महीनों तक रह सकता है।

कौन सी राशियों पर अधिक प्रभाव पड़ता है?

जिस राशि और नक्षत्र में ग्रहण होता है, उस राशि के जातकों पर इसका अधिक प्रभाव देखा जाता है।