



वैदिक ज्योतिष के अनुसार ग्रहण तब होता है जब राहु और केतु सूर्य या चंद्रमा के साथ संरेखित होते हैं। ग्रहण दो प्रकार के होते हैं – सूर्य ग्रहण (अमावस्या) और चंद्र ग्रहण (पूर्णिमा)। दोनों को शक्तिशाली और कर्मिक परिवर्तनकारी घटना माना जाता है।
ग्रहण मन, आत्मविश्वास, संबंध, करियर और जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। इसका प्रभाव आपकी चंद्र राशि, लग्न और जन्म कुंडली पर निर्भर करता है।
सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आकर सूर्य के प्रकाश को ढक देता है। सूर्य आत्मा, पिता, पद-प्रतिष्ठा और नेतृत्व का कारक है, इसलिए इस समय इन क्षेत्रों में परिवर्तन संभव है।
चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आती है। चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक है, इसलिए इस समय भावनात्मक उतार-चढ़ाव और आंतरिक परिवर्तन अनुभव हो सकते हैं।
ग्रहण से पहले शुरू होने वाला सूतक काल आध्यात्मिक रूप से संवेदनशील माना जाता है। इस दौरान शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है, जबकि जप, ध्यान और दान करना शुभ माना जाता है।
ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और दान करना शास्त्रसम्मत और लाभकारी माना जाता है। ग्रहण का समय आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष होता है।
ग्रहण आत्मचिंतन, कर्म शुद्धि और नई शुरुआत के लिए उत्तम समय है। उचित ज्योतिषीय मार्गदर्शन से इसके प्रभाव को सकारात्मक बनाया जा सकता है।
नहीं, इसका प्रभाव व्यक्ति की जन्म कुंडली, राशि और वर्तमान दशा पर निर्भर करता है।
जप, ध्यान और दान करना शुभ है, जबकि शुभ कार्यों से बचना चाहिए।
इसका प्रभाव जन्म कुंडली के अनुसार बदलता है और कई महीनों तक रह सकता है।