



पंचक वैदिक ज्योतिष में चंद्र आधारित पाँच नक्षत्रों की अवधि है। यह तब प्रारंभ होता है जब चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण (कुंभ राशि) में प्रवेश करता है और तब समाप्त होता है जब चंद्रमा रेवती नक्षत्र से निकलकर अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है।
पंचक की गणना निरयन (Sidereal) राशि प्रणाली और चंद्रमा की सटीक डिग्री स्थिति के आधार पर की जाती है। यह लगभग पाँच दिनों तक चलता है, क्योंकि चंद्र प्रतिदिन लगभग १३°२०′ चलता है।
धनिष्ठा नक्षत्र २३°२०′ मकर से ६°४०′ कुंभ तक फैला है। पंचक की शुरुआत कुंभ (धनिष्ठा तृतीय चरण) से मानी जाती है। इसके बाद शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र आते हैं। रेवती के अंत पर पंचक समाप्त होता है।
पंचक को चंद्रमा की अंतिम चक्र अवधि माना जाता है, जो समापन, कर्म निष्पत्ति और ऊर्जा परिवर्तन का संकेत देता है। परंपरागत रूप से इस समय कुछ कार्यों में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। परंतु इसका प्रभाव व्यक्ति की जन्म कुंडली पर निर्भर करता है।
जिस वार से पंचक प्रारंभ होता है, उसके अनुसार इसे रोग पंचक, राज पंचक, मध्यम पंचक, अग्नि पंचक, मृत्यु पंचक और चोर पंचक में विभाजित किया जाता है।
सभी को समान रूप से नहीं। इसका प्रभाव व्यक्ति की जन्म कुंडली पर निर्भर करता है, विशेष रूप से चंद्र की स्थिति, शनि का प्रभाव और चल रही दशा पर। सामान्य मान्यताओं की तुलना में व्यक्तिगत कुंडली का विश्लेषण अधिक सटीक होता है।
जब चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण में प्रवेश करता है।
जब चंद्रमा रेवती नक्षत्र से निकलकर अश्विनी में प्रवेश करता है।
लगभग पाँच दिनों तक, चंद्रमा की गति पर निर्भर करता है।
नहीं। इसका प्रभाव व्यक्तिगत कुंडली और दशा पर निर्भर करता है।