



वैदिक ज्योतिष में भद्रा को विष्टि करण कहा जाता है, जो पंचांग के ग्यारह करणों में से एक है। भद्रा को शुभ कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है और किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से पहले भद्रा विचार किया जाता है।
भद्रा विशेष तिथि के दौरान आती है और इसका समय प्रत्येक माह बदलता रहता है। यह शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष में हो सकती है।
भद्रा का स्वामी शनि ग्रह है, जो कर्म और अनुशासन का कारक है। इसलिए भद्रा काल में महत्वपूर्ण निर्णय सोच-समझकर लेने चाहिए।
पंचांग में प्रत्येक तिथि दो करणों में विभाजित होती है। विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है। इस समय विवाह, गृह प्रवेश, या नए कार्य प्रारंभ करने से बचा जाता है।
हालांकि, भद्रा काल साहसिक, प्रतियोगी या कानूनी कार्यों के लिए शुभ माना जाता है।
भद्रा का प्रभाव उसके लोक पर निर्भर करता है – स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक या पाताल लोक। स्वर्ग या पाताल लोक में भद्रा का दुष्प्रभाव कम होता है, जबकि मृत्यु लोक में अधिक संवेदनशील माना जाता है।
नही, यह मुख्यतः शुभ कार्यों के लिए अशुभ है, लेकिन साहसिक कार्यों के लिए अनुकूल मानी जाती है।
भद्रा का समय पंचांग में करण और तिथि परिवर्तन के आधार पर निर्धारित होता है।
परंपरागत रूप से भद्रा काल में विवाह और अन्य शुभ संस्कार टाले जाते हैं।